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महिलाओं के प्रति सोच बदलने की जरुरत

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पिछले दिनों समाप्त हुए ओलिंपिक खेलों की बात करें या पैरा ओलंपिक खेलों की, लगभग १३२ करोड़ जनसँख्या वाले हमारे देश की विश्व पटल पर पहचान बनाये रखने और नाक ऊँची रखने में हमारे देश की महिलाओं ने जो योगदान दिया , उसके बाद से ये उम्मीद की जाने लगी है की शायद अब हमारे देश में नारी का सम्मान बढ़ेगा और देश की पुरुषवादी सोच में कुछ परिवर्तन आएगा . लेकिन इसके बाद भी देश के कुछ हिस्सों में महिलाओं पर अत्याचार और उत्पीडन की घटनाओं में कोई कमी नहीं आ रही है. दरअसल हमारे सामाजिक परिवेश की जड़ें ही ऐसी हो गयी है जहां लड़के लड़कियों में भेदभाव उनके जन्म से ही आरम्भ हो जाता है । यही भेदभाव शायद सबसे बड़ा कारण है नारी के पिछड़ेपन का । कभी कभी तो हर मामले में योग्य होने के बावजूद उसे सिर्फ इसलिए पीछे रहना पड़ता है क्योंकि वह एक नारी है ।
जहाँ तक आजकल की आम चर्चा का विषय बना नारी के अस्तित्व और उससे हो रही छेड़छाड़ की बात है तो यह न सिर्फ एक मानसिक समस्या है वरन इससे कहीं ज्यादा सामाजिक समस्या भी है । वास्तव में नारी के पिछड़ेपन की दयनीय स्थिति की जड़े इतिहास और समाज में ही है । हाँ, यह हो सकता है इसकी स्थति , अलग अलग देशों और वहां के समाज के स्तर के अनुसार भिन्न भी हों।
अब अगर अपने देश की बात करें तो यहाँ कुछ समय से नारी भ्रूण हत्या की घटनाओ में अचानक बढोत्तरी हुई है । इसके पीछे शायद माँ बाप के मन में होने वाली बेटी को लेकर असुरक्षा की भावना ही सबसे महत्वपूर्ण कारण है । एक और कारण हमारे समाज में जड़ बनाये बैठे लिंग भेद भी है । अधिकांश परिवारों में जहाँ लडको को आरम्भ से ही जीने की स्वतंत्रता मिली होती है वहीँ लड़कियों को ज्यादा बोलने , ज्यादा हसने , ज्यादा घूमने यहाँ तक की ज्यादा पढाई लिखाई की भी स्वतंत्रता नहीं होती ऐसे में आरभ से ही लड़कियों में हीन भावना पैदा हो जाती है । धीरे धीरे यही सोच लड़कियों को कमजोर बनाती है और लडको को उनपर हावी होने का अवसर प्रदान करती है । बढती छेड़छाड़ की घटनाओ के पीछे यही महत्वपूर्ण कारण है।
दरअसल इसके मूल में समाजीकरण की ही प्रक्रिया है। इसके लिए किसी एक पुरुष या समाज के किसी एक हिस्से को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता वरन जिम्मेदार हमारा पूरा सामाजिक ढांचा है जिसे बदलना ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यद्यपि पिछले कुछ समय में सरकार भी इस ओर सचेत हुई है। “बेटी बचाओ , बेटी पढ़ाओ ” योजना , स्कूल चलो ,सेल्फ़ी विथ डॉटर , ऐसे कई कार्यक्रम शुरू करके सरकार ने लड़कियों के जन्म, उनके पालन पोषण और पढाई लिखाई पर विशेष ध्यान देना आरंभ कर दिया है। इस बात में संदेह नहीं की पिछले कुछ समय में परिस्थिति में परिवर्तन आया है। पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं ने हर क्षेत्र में बड़ी उचाइयां हासिल की है , ग्राम सभा स्तर पर लगभग १२ लाख महिलाओं को स्थानीय नेतृत्व का ऐतिहासिक मौका मिला है , प्रदेश और देश की राजनीती में भी उनकी भागीदारी बढ़ी है . वर्तमान लोकसभा में अबतक की सबसे बड़ी संख्या में महिला जनप्रतिनिधि शामिल है .लेकिन इन सबके बावजूद हम नारी को सामान अधिकार देने की बाते तो बहुत करते है पर शायद पूरे मन और विश्वास से नहीं . हमारे ही समाज के बहुत सारे लोग आज भी नारी को उपभोग की वस्तु ही समझते है और यही सोच नारी की प्रगति में बाधक है . अधिकांश घरों और परिवारों में पुरुष सत्ता ही कायम है , जहाँ घर के किसी भी निर्णय में पुरुषों की ही चलती है , वहां न तो महिलाओं से विचार रखने को कहा जाता है , न ही उन्हें ऐसा कोई अधिकार है . भले ही उस विषय पर वे अच्छी राय दे सकती हो और उससे परिवार का भला हो सकता हो.
अब समय आ गया है की हम सब को इस विषय की गम्भीरता को समझते हुए अपने विचारों में परिवर्तन लाना होगा। जिससे समानता की परिभाषा यथार्थ हो सके।

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MANOJ SRIVASTAVA के द्वारा
September 20, 2016

acche lekh ke liya badhai


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