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कितने असंवेदनशील होते जा रहे है हम

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मानव जीवन का महत्वपूर्ण गुण है संवेदना, जिसके माध्यम से वो अपने परिवार , समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में सफल होता है। जिस मनुष्य में जितनी अधिक संवेदना होती है , वो अपने परिवार और समाज से उतना ही जुड़ा होता है । एक संवेदनशील व्यक्ति के अंदर ही मानवता की भावना जागृत होती है। हमारे ऋषियों , मुनियों और महापुरुषों के अंदर मानवीय संवेदना ही थी जिसके बल पर उन्होंने समाज और राष्ट्र को नयी दिशा दी और उसका स्वरुप बदला है। संवेदना व्यक्ति को अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर व्यक्ति से परिवार , परिवार से समाज , समाज से राष्ट्र के हित के लिए कार्य करने को प्रेरित करती है। संवेदना मानवीय संबंधों का आधार है। लेकिन बड़े ही अफ़सोस की बात है की आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमारे अंदर से , हमारे परिवार और समाज से मानवीय संवेदनाएं समाप्त होती जा रही है। विकास की गति को तीव्र करने की चाहत में मशीनों और कम्प्यूटर पर हमारी निर्भरता बढ़ती जा रही है और परिणाम स्वरुप दूसरों से आगे निकलने की ललक में हम अपनी संवेदना खोते जा रहे है। आज हम स्वयं मशीन हो गए है जिसमे कार्यक्षमता तो भरपूर है पर मानवीय संवेदना शून्य है।
पिछले दिनों मीडिया और सोशल साइट्स पर नाबालिग बच्चो द्वारा एक जानवर को जिन्दा जलाने की घटना मानवीय सम्वेदना समाप्त होने की प्रक्रिया की ओर ही इशारा करती है। गुजरात में दलितों को सरे आम कार से बांधकर दर्दनाक पिटाई करना , वृद्ध दंपति को मात्र 15 रुपयों के लिए कुल्हाड़ी से काट डालना, एक माँ द्वारा अपने निजी सुख में बाधक बनने वाले मासूम बच्चे को गला दबाकर मार डालना , अपने अहम् की संतुष्टि के लिए पति द्वारा पत्नी की बेरहमी से हत्या करना , मानवीय असंवेदनशीलता का ही धोतक है। लगभग रोज ही हम ऐसी अमानवीय घटनाओं से दो चार होते है . टी वी और समाचार पत्रों में संपत्ति और पैसों के लिए लोगों को अपने माँ और बाप के क़त्ल करने की घटनाये पढ़ते है और बहुत ही छोटा रिएक्शन देकर उसे भूल जाते है। लेकिन ये घटनाये हमारे बीच बढ़ते मानवीय प्रदूषण की ओर संकेत कर रही है। यदि मानव समाज से भावनाएं , सहानुभूति और संवेदना निकाल दी जाए तो हम में और जानवरों में फर्क ही क्या रह जायेगा। आप खुद विचार करें की सड़क पर दुर्घटना का शिकार हुए किसी शख्स की आप कितनी बार सहायता करते है ,जबकि हम ये जानते है की शायद हमारी थोड़ी सी सहायता उसकी जान बचा सकती है। जाने अनजाने रोजमर्रा की जिंदगी में हमारे घरों में बुजुर्गो को हम कितना सम्मान देते है। बेबस और लाचार वृद्धों से हम कितनी सहानुभूति या अपनापन दिखा पाते है। आगे बढ़ने की चाहत में आज समाज में भाई – भाई , बहन- भाई , बाप – बेटे , पति – पत्नी के बीच खाइयां बढ़ती जा रही है. इतना ही नहीं पति पत्नी के बीच भी पैसे और पोजीशन को लेकर सामन्जस्य स्थापित नहीं हो पाता और आपसी लगाव और अपनेपन की कमी के कारण वे एक दूसरे के दुश्मन बन जाते है और परिवार बिखर जाता है। प्रगति के इस वातावरण में सामाजिक , आर्थिक और वैचारिक असमानता के कारण प्रत्येक व्यक्ति के मन में इर्ष्या और द्वेष की भावना ने जन्म ले लिया है , भाई हो या बहन या कोई अन्य सम्बन्धी , मित्र हो या पडोसी द्वेष और इर्ष्या के अनेक कारण हो सकते हैं ,जैसे रहन सहन या जीवन शैली में भारी अंतर ,पारिवारिक स्थिति में अंतर ,शिक्षा स्तर या पद में अंतर अर्थात इर्ष्या का कारण कोई भी,किसी भी प्रकार की आपसी तुलना हो सकती है. ये सभी स्थितियां सामाजिक प्रदूषण बढ़ा रही है.
लेकिन ये स्थिति किसी भी सभ्य समाज और लोकतान्त्रिक राष्ट्र के लिए अच्छी नहीं है। इसीलिए आज इस बात पर गंभीरता से चिंतन और मनन करने की आवश्यकता है। यदि समय रहते हमारी संवेदनाएं पुनः जागृत नहीं हुई और परिस्थितियां नहीं बदली तो हमारे परिवार और समाज का पतन अवश्यम्भावी है।

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rameshagarwal के द्वारा
August 9, 2016

जय श्री राम मनोज जी भारत एक अध्यात्मिक देश था ऋषि परंपरा ने हम लोगो कोअच्चे सवेंदनशील इंसान बना कर अनुशासित जीवन जीने की कला सिखाई थी लेकिन अंग्रेज़ी शिक्षा और आधुनिकता ने हमें मतल्वी बना दिया जहाँ पैसा ही सब कुछ सारे रिश्ते बेकार.पच्छिम में माँ बाप ली जायदाद में बच्चे अधिकार नहीं जमा सकते इसलिए इस तरह के अपराध कम होते हमारे गुरु अध्यात्मिक की शिक्षा देकर बहुत नियंत्रित कर रहे परन्तु कमी के कोइ आसार नहीं सुन्दर लेख के लिए बधाई .

MANOJ SRIVASTAVA के द्वारा
August 9, 2016

THANKS SIR


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