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पाकिस्तान के नापाक मंसूबे

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वर्तमान परिदृश्य में अपने देश की सुरक्षा खतरे में दिखती है , बार बार सुरक्षा एजेंसियों का आतंकवादी हमलों कि संभावना जताना पडोशी मुल्क पाकिस्तान के नापाक मंसूबे को दर्शाता है . इतना ही नहीं राष्ट्रिय सुरक्षा सलाहकार स्तर की वार्ता के पहले पाकिस्तान द्वारा बार बार चली जा रही चालें उसकी सोची समझी राजनीती का हिस्सा लग रही है और ऐसे में यही लग रहा है की पाकिस्तानी प्रधान मंत्री एक कठपुतली की मानिंद रह गए है और वे वही बोलते और करते है जो वहां के आतंकवादी और वहां की सेना चाहती है . अनिश्चितता के इस वातावरण में भारत ये बिलकुल नहीं चाहता कि पाकिस्तानी राष्ट्रिय सुरक्षा सलाहकार नयी दिल्ली में हुर्रियत नेताओं से बातचीत करें. जबकि पाकिस्तान अपनी कूटनीतिक चालों के अधीन इस बात पर जोर दे रहा है . ये एक प्रकार से उफ़ा समझौते की मूल भावना के विरुद्ध है . यही नहीं वो कश्मीरी अलगाववादियों से वार्ता के साथ साथ नए नए मुद्दे जोड़कर खुद ही अड़ंगेबाजी कर रहा है . पाकिस्तान ने कभी भी सीज फायर का अनुपालन नहीं किया है . इधर वार्ता होती है उधर गोली बारी होती है . इतने से ही उसे संतोष नहीं हुआ तो गुरदास पूर में आतंकी हमले करवाया . उधमपुर में आतंक के लिए नावेद जैसे आतंकियों को भेजा गया आखिर ये सब उसकी सोची समझी चाल का ही तो नतीजा है . पाकिस्तान में राष्ट्रमंडल संसदीय संघ संमेलन में जम्मू कश्मीर के विधान सभा अध्यक्ष को न बुलाना उसकी गुस्ताखी की हद ही है .
लेकिन अपनी आदत से मजबूर , पाकिस्तान भले ही पूरे विश्व समुदाय के सामने आतंकवाद फ़ैलाने और आतंकवादी गतिविधियों में अपने न सम्मिलित होने की साफगोई देता रहे पर उसकी कुत्सित भावनाओ से परिपूर्ण चेहरा बार बार बेपर्दा होता रहा है .आतंकवाद के विषय में पाकिस्तान झूठ बोलने में माहिर है . सीधे सीधे सच्चाई को नकारना उसकी फितरत है . ऐसा नहीं है कि आतंक से केवल भारत को नुक्सान होता है वरन इसके छीटें कभी कभी उसकी अपनी जनता पर भी पड़ते है और वहां भी जान माल की हानि होती है . आतंकवाद भारत के लिए ही नहीं वरन पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय है . पर पाकिस्तान द्वारा आतंकवादियों को दिए जा रहे संरक्षण और पोषण के कारन भारत सबसे ज्यादा प्रभावित है . आतंक कैसा भी हो इसमें सिर्फ रक्त ही बहता है वो भी निर्दोषों और मजलूमों का . अब वक्त आ गया है भारत सरकार इस बात पर गौर करे कि बात चीत के अलावा पाकिस्तानी चालों का विरोध किया जाये क्योंकि बार बार यही लगता है अब सुधरेगी स्तिथि पर ऐसा होता नहीं. पाकिस्तान का रुख यही है की वो भारत को उकसाए ताकि भारत कोई ऐसी गलत बयानी करे जिससे उन्हें सबकी सहानुभूति प्राप्त हो लेकिन ऐसा कुछ होता नज़र नहीं आ रहा . अच्छा ये हुआ की केंद्र सरकार ने ये मन बना लिया है की कुछ भी हो जाये वे पाकिस्तानी सुरक्षा सलाहकारों को वार्ता के पहले हुर्रियत नेताओं से मिलने नहीं देंगे . इससे कही न कही पाकिस्तान पर दबाव बनेगा और उनके नापाक मंसूबे कमजोर पड़ेंगे . लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं की भारत को पाकिस्तान की दादागिरी को रोकने के ठोस उपाय करने होंगे.

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